पेट्रोलियम पदार्थों व सोना की कीमतों की तुलना

मनुष्य स्वभाविक रूप से पदार्थों, घटनाओं व व्यक्तियों की तुलना करता है। यह प्रवृत्ति मनुष्य के स्वभाव में अन्तर्निहित होता है। सामान्यतः तुलना आधार उक्त पदार्थ की उपयोगिता व महत्ता के आधार होता है। कई बार ये तुलना असंगत पदार्थों, घटनाओं व व्यक्तियों के बीच किए जाने की प्रवृत्ति भी देखी जाती है जो अक्सर बेतुका व बेमानी ही होता है जो कुछ निहित स्वार्थों (राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक या सांस्कृतिक) के पूर्ति हेतु किया जाता है। हालाँकि कई बार असंगत तुलना भी कुछ परिणामों तक पहुँचने में उपयोगी होता है। लेकिन एक तथ्य यह भी है सोना व पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में एक सीधा संबन्ध होता है।

इन दिनों पेट्रोलियम उत्पादों और सोने की ऐतिहासिक कीमतों के बीच असंगत तुलना की जा रही है। दोनों पदार्थों की उपयोगिता व महत्ता को देखते हुए इस तरह की कोई भी तुलना पूर्णतः बेतुकी व बेमानी दिखाई देती है और इन तुलनाओं का उद्देश्य सकारात्मक चर्चा व विमर्श ना होकर वरन राजनैतिक आरोपों प्रत्यारोपों तक ही सीमित है।

सोना एक ऐसा पदार्थ नहीं है जो भारतीय नागरिकों व अर्थव्यवस्था हेतु अत्यावश्यक वस्तु हो। हालाँकि सोना का जीवन में औषधीय व अन्य महत्त्वपूर्ण उपयोग जरूर है। परन्तु दूसरी ओर पेट्रोलियम पदार्थ भारत के लिए एक अत्यावश्यक वस्तु है और वर्तमान की आधुनिक अर्थव्यवस्था में एक बहुत भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। अतः सबसे पहले ऐसी कोई भी तुलना होनी ही नहीं चाहिए।

दूसरी तरफ इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों की महँगाई पर दोहरी मार पड़ती है। सीपीआई बास्केट में कच्चा तेल का ईंधन व प्रकाश और परिवहन व संचार नामक दो हेड्स के अंतर्गत दोहरा योगदान होता है जो सम्मिलित रूप से पूरे बास्केट का 15.43% है और यह संख्या सापेक्षिक रूप से एक बड़ी संख्या है। जबकि सोना की स्तिथि ऐसी नहीं है। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि हर तरह की अनावश्यक तुलनाओं को छोड़कर केंद्र और राज्य सरकारें साथ मिलकर बढ़ती कीमतों को ना सिर्फ नियंत्रित करें बल्कि एक मेकेनिज्म बनाएं जो भविष्य में तेल उत्पादों की कीमतों को एक बैण्ड के भीतर स्थिर कर सके। अन्यथा बढ़ती महँगाई असर अर्थव्यवस्था में व्यापक रुप से पड़ेगा।
 
राजीव उपाध्याय

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