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गलत कौन? कंगना राणावत या कुलविन्दर कौर?

अभिनेत्री कंगना राणावत अभी सम्पन्न हुए 2024 के आम चुनाव में हिमाचल प्रदेश के मंडी से सांसद का चुनाव जीता है। पिछले दिनों कंगना राणावत जब चंडीगढ़ एयरपोर्ट से फ्लाइट पकड़ने के लिए चेक-इन कर रही थीं उसी समय चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर पोस्टेड सीआईएसएफ की सुरक्षाकर्मी कुलविंदर कौर ने कंगना राणावत को थप्पड़ मार दिया। कुलविंदर कौर ने उस दुर्व्यवहार को सही बताते हुए इस कारण कंगना राणावत का किसान आन्दोलन में बैठे लोगों के प्रति किया नकारात्मक टिप्पणी से आहत होना बताया।

जबसे कुलविंदर कौर ने कंगना राणावत को थप्पड़ लगाया है वो सोशल मीडिया पर एक वर्ग द्वारा हीरो के रूप में प्रदर्शित की जा रही है; तो वहीं दूसरा वर्ग उसे गलत बता रहा है।

तो क्या कुलविंदर कौर सचमुच हीरो है?

या वह गलत है?

Judiciary Must be Reformed

Son of a rich and influential family, Vedant Agarwal has all rights to fly on the roads with his Porsche and if some stupid people comes in his ways and get killed, it is their fault, not Vedant's. For this crime, judges who granted him bail must register a case against to those who died in this accident! Basically the victim is the that juvenile whose right to fly on the road was interfered with. He should be compensated for this and the Milords must give a new historic order and may be establish a fund to compensate him so that none does this even in the future.

Sarcasm on one side but it can be said that the Judiciary in India is completely. The way Milords have granted bail to this so called juvenile Vedant Agarwal, 17 years son of a builder, loudly tells how sick the judiciary has turned! But no questions will be asked or no investigation against the judge will ordered by the Supreme Court of India!!

अग्निवीर नहीं बनना है!

आपको अग्निपथ योजना पसंद नहीं है! बढिया है। बहुत अच्छी बात है। बिल्कुल विरोध करिए। मैं तो कहता हूँ जमकर विरोध करिए किन्तु तरीका बदलकर। थोड़ा सृजनात्मक तरीके से विरोध करिए।

जब सरकार को भर्ती करना होगा तो तय है कि विज्ञापन निकालेगी ही। बस आपको करना ये है कि सरकार चाहे कितने भी विज्ञापन निकाले, आप भर्ती होने जाइए ही मत! क्या कर लेगी सरकार? कुछ नहीं।

अग्निपथ योजना, हिंसा व अराजकता

हिंसा धीरे-धीरे भारतीय समाज में प्रतिक्रिया व असहमति के संप्रेषण का मुख्य व स्थाई भाव बनता जा रहा है। कभी धर्म के नाम पर, कभी कानून के विरोध में, कभी किसी योजना के ना पर तो कभी किसी भ्रष्ट नेता के भ्रष्टाचार के समर्थन में सिर्फ देश को हिंसा के आग में ही नहीं बल्कि युवाओं को एक अंधेरी गुफा में भी ढकेला जा रहा है। इससे ना तो देश का भला होनेवाला है और ना ही उन युवाओं का उकसाए जाने के बाद हिंसा का माध्यम बनते हैं। लेकिन कहते हैं ना कि किसी के हानि में किसी ना किसी का लाभ छुपा होता है और इन हिंसक घटनाओं में तो हितधारकों का दोहरा लाभ छुपा होता है। इन हिंसक घटनाओं का दोहरा लाभ उन दलों व संस्थाओं को मिलता है जो युवाओं का उकसाकर इस हिंसा को फैलाते हैं। उन दलों व संस्थाओं को ढेर सारी चर्चाओं व सहानुभूति के साथ-साथ बड़ी संख्या में स्थाई कार्यकर्ता जरूर मिल जाएंगे।

बंगाल की हिंसा व सामूहिक चुप्पियाँ

कहा जाता है भारत में रातों रात बड़ा आदमी बनने का रास्ता सामान्यतः राजनैतिक गलियारों से होकर गुजरता है। संभवतः ये पूरी दुनिया व हर काल के लिए सत्य हो। खैर। इस राजनैतिक गलियारे ने सामाजिक स्तर पर व्यक्तिगत व राजनैतिक विभेद को लगभग पूर्णतया समाप्त कर दिया है। अब हर सार्वजनिक चीज व्यक्तिगत हो चुकी है और हर व्यक्तिगत चीज सार्वजनिक बनकर राजनैतिक हो चुकी है। बाजार की बढ़ती शक्ति ने बचे-खुचे विभेद को भी इतना पारदर्शी बना दिया है कि अब वो विभेद प्रभावी रुप से संभवतः रह ही नहीं गया है और जो विभेद को देख सकते हैं उनकी होने या ना होने से किसी को बहुत फर्क नहीं पड़ता।

The Kashmir Files व रेटिंग का खेल

The Kashmir Files पर हो रहा उचित व अनुचित चर्चाओं-परिचर्चाओं ने इस फिल्म के प्रति लोगों में गजब का आकर्षण पैदा कर दिया है। दो-तीन पहले फिल्म देखने के इरादे से मैंने गूगल पर The Kashmir Files किस थिएटर में लगी है जानने के लिए सर्च किया तो बहुत ही इंटरेस्टिंग व विरोधाभासी सूचना हाथ लगी थी

जैसा कि सभी को पता है कि अनेकों समाचारपत्र व बेवसाइट्स फिल्मों पर अपने रेटिंग प्रकाशित करते हैं। उसी क्रम में IMDb व Paytm जैसी संस्थाएँ भी The Kashmir Files की रेटिंग्स प्रकाशित की हैं जो सामान्य दर्शकों की राय से तैयार होती हैं। IMDb व Paytm के अनुसार इस फिल्म को उस दिन 9.9/10 की रेटिंग मिला था जो अब गिर कुछ कम हो गया है। हालाँकि उसी दिन The Indian Express ने The Kashmir Files की रेटिंग 1.5/5 दिया था। The Indian Express अपना रेटिंग एक्पर्ट की राय द्वारा तय करता है। दूसरी ओर The Kashmir Files एक दूसरा पोस्टर भी हाथ लगा जो IMDb व Paytm वाली राय ही इंडोर्स कर रहा था। उस पोस्टर में लगभग सभी बड़े नामों फिल्म को बहुत अच्छी रेटिंग्स दिया था

The Assault on Arnab Goswami and the Freedom of Press

The tone and vendetta journalism of Arnab Goswami can never be appreciated in any way. His activism in the name of journalism in cases of Sushant Singh suicide, Kangana Ranaut, Rhea Chakraborty as well as the personal attacks on different politicians and personalities than asking uncomfortable questions using the platform of a TV channel was uncalled for. However in the heightened emotions of political hue and cry, this hooglism seemed justified to millions of Indians who enjoyed it but at their own deadly cost (to be paid in future)!

A Narrative and Religion of Violence

You may find all the valid reasons to justify the attack on Arnab Goswami. You can put forth n numbers of arguments against him to justify what happened. Even you may end up having a fabulous vision too! That's okay. No questions asked.

But remember, you would also be treated in the same way some day by somebody for the same reason that is airing your views! That moment you will feel vulnerable. Then perhaps you will find yourself very weak and will cry when nobody will stand up for you. However, that also would be a bad thing but that would be just a continuation of the same bad precedent that has been and is being justified on social media by many. A narrative and religion of violence! But the Karma comes back to haunt us all till the end! No matters who we are?

कोरोना और दीपक जलाना

मैं नहीं जानता कि दीपक जलाने या फिर ताली बजाने से इस आपद काल में कितना लाभ होगा? होगा भी कि नहीं; नहीं मालूम। परन्तु इस बात को लेकर सभी सहमत होंगे कि इससे किसी का किसी भी तरह से कोई नुकसान नहीं होगा। आपद काल में हर वो तरीका जिससे थोडा सा भी लाभ मिल सकता है या फिर लाभ मिलने की लेस मात्र की संभावना है उसे आजमाने से नहीं चुकना चाहिए। चाहे वो लाभ प्रत्यक्ष हो या फिर अप्रत्यक्ष ही क्यों ना हो?

कोरोना वायरस, लॉकडॉउन और बैंकों लगती भीड़

कोरोना वायरस, लॉकडॉउन और बैंकों लगती भीड़केन्द्र और राज्य सरकारों ने कोरोना वायरस के प्रकोप को देखते हुए गरीब, मजदूरों और अन्य वंचित वर्गों के लिए सहायता राशि देने का निर्णय लिया है जो भारत जैसे गरीब एवं सीजनल रोगजार वाले देश के लिए एक बहुत ही जरूरी एवं कारगर पहल साबित हो सकती है। हालाँकि सहायता हेतु घोषित योजनाओं (केन्द्र व राज्य) को देखकर ऐसा लग रहा है कि शायद सरकारें कोरोना को सिर्फ कुछ हफ्तों की फीनोमिना मान रही हैं। हालाँकि ये भी संभव है कि सरकारें चरणगत तरीके से योजनाएँ बना रही हों।

केंद्र और राज्य सरकारों ने जबसे कोरोना वायरस के कारण फैलती महामारी और लॉकडॉउन के कारण संकट में आए लोगों के लिए सहायता एवं नरेगा राशि रीलीज किया है तबसे देश भर के बैंकों में बहुत ही ज्यादा भीड़ लगने लगी है। इस भीड़ के कारण सोशल डिस्टेंसिंग की सारी कोशिशें नाकाम हो रही हैं और लॉकडॉउन के कारण जो कुछ भी हाशिल हुआ है उसे खोने का डर पैदा होने लगा है। इस स्थिति में सरकार को इस सहायता राशि को लोगों तक पहुँचाने के तरीके को बदलना चाहिए। बेहतर होगा कि लोगों के बैंक जाने के बदले बैंक ही गाँव-गाँव जाकर इस पैसे का वितरण करें। इस काम में ग्राम पंचायतें एवं पुलिस एक बहुत ही सकारात्मक व बेहतर भूमिका निभा सकती हैं।

लॉकडॉउन, डर और घर की तरफ जाते हुए लोग

दिल्ली, मुम्बई व अहमदाबाद, हर बड़े शहरों से लोग भागकर अपने गाँव और घरों की ओर लौटना शुरू कर दिए हैं। इन शहरों के बस स्टेशनों पर भीड़ है। एक बहुत बड़ी भीड़। हजारों-लाखों लोग अपने घरों की तरफ लौट पड़े हैं कुछ पैदल तो कुछ सरकार द्वारा उपलब्ध कराए यातायात साधनों से। समाचार चैनेल, अखबार व सोशल मीडिया ऐसी सूचनाओं से भरा पड़ा है।

अपने घरों की तरफ जाते हुए लोगों को जो जहाँ है वहीं रोकने के लिए भोजन, आवास व स्वास्थ्य की समुचित सुविधाओं की वैकल्पिक व्यवस्था करना आवश्यक है ना कि उनके जाने के बस या ट्रक की। अभी वे किसी राज्य या जिला विशेष के निवासी या फिर भार नहीं वरन नागरिक हैं जो कोरोना वायरस के संभावित कैरियर भी हो सकते हैं। वे भारत की केंद्रीय व राज्य सरकारों की जिम्मेवारी हैं। अब तक सरकारों ने अपना काम बहुत बढिया से किया है। परन्तु इन लोगों का इस तरह से देश के एक कोने से दूसरे कोने में जाना इस लॉकडॉउन के उद्देश्य एवं सरकारों व स्वास्थ्य विभाग के सभी प्रयासों को असफल बना सकता है। भारत अभी उस मोड पर खडा है जहाँ उसमें लॉकडॉउन की असफलता को बर्दाश्त कर पाने की क्षमता नहीं है। ना ही आर्थिक और ना ही स्वास्थ्य की मूलभूत सुविधाओं की।

अर्थ डे के लिए

आप प्रगतिशीलता के पक्षधर बनकर चाहे जितने सेमीनार, सभा, नुक्कड़ नाटक, वैज्ञानिक शोध या चाहे जो जी में आए करिए कोई रोकेगा नहीं परन्तु आपके इन प्रयासों से तब तक होने वाला कुछ नहीं है जब तक कि आप प्रकृति के साहचर्य में जीना प्रारम्भ नहीं करते और इसके लिए अंततः आपको उसी भारतीय जीवन पद्धति को अपनाना पड़ेगा जिसे आप गालियाँ दे-देकर गलत बताते नहीं थकते। आज मराठावाड़ा और बूँदेलखण्ड सूखे के चपेट में हैं। कल बघेलखण्ड, पश्चिम उत्तरप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, आन्ध्रा और कर्नाटक भी मराठावाड़ा और बूँदेलखण्ड का साथ निभाएंगे।