स्टैण्डर्ड एन्ड पूअर्स के द्वारा किए गए साख सुधार का निहितार्थ

प्रधानमंत्री मोदी की अमेरीका यात्रा से तुरन्त पहले अमेरीका स्थित स्टैण्डर्ड एन्ड पूअर्स नामक रेटिंग संस्था, जो आर्थिक एवं वित्तिय साख का आकलन करती है, ने भारत की साख को सुधारते हुए नकारात्मक से स्थिर की श्रेणी में वर्गीकृत किया है (Nair, Rebello, & Ami Shah, 2014)। रेटिंग में यह सुधार सामान्य रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा और कुछ हद तक सकारात्मक है। परन्तु रेंटिंग में यह सुधार प्रधानमंत्री के अमेरीका यात्रा से तुरन्त पहले ही हुआ है, तो देश में एक विवाद एवं विमर्श शुरू हो गया है कि क्या अमेरीका भारतीय प्रधानमंत्री को मीठी घूँट के सहारे कोई कड़वी दवा पीलाना चाहता है? हो सकता है कि ऐसा ही हो क्योंकि भारत में अमेरीका का बहुत बड़ा आर्थिक हित (विशेषकर विदेशी निवेश) निहित है जिसको वह प्रधानमंत्री और वर्तमान सरकार को साधकर जरूर सुरक्षित करना चाहेगा। इसमें कोई बहुत बराई भी नहीं है क्योंकि वर्तमान परिदृश्य में अन्तराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक संबन्धों का उपयोग राजनैतिक एवं कूटनीतिक हथियार के रूप में सर्वमान्य है। अब ये भारतीय प्रधानमंत्री के विवेक और कौशल पर निर्भर है वे अमेरीका के कूटनीतिक प्रयासों से कैसे निपटते हैं एवं वो भारत के हितों का कहाँ तक ख्याल रख पाते हैं?

किसी भी अर्थव्यवस्था के साख के निर्धारण में कुछ आवश्यक अवयवों का ख्याल रखा जाता है जिसमें से दो अवयव सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। साख निर्धारण की प्रक्रिया में लम्बी एवं नजदीकी अवधि के लिए सर्वप्रथम अर्थव्यवस्था के भविष्य को आंका जाता है। तदपश्चात राजनैतिक स्थिरता एवं प्रशासन की गुणवत्ता को आंका जाता है। यदि भारत की अर्थव्यवस्था पर ध्यान दें तो पाएंगे कि कुछ समय से भारतीय अर्थव्यवस्था कई तरह की समस्याओं से गुजर रही है जिसमें प्रशासनिक निर्णयों में बहुत देरी या फिर निर्णय ना लेनी का स्वभाव तथा जवाबदेही का लगभग ना होना, उच्च स्तर की मंहगाई एवं जीडीपी की गिरती विकास दर मुख्य रही हैं। इससे पहले कि हम साख के सुधार में निहित उद्देश्यों या फिर किसी और विषय की ओर बढ़े, आवश्यक है कि संस्था द्वारा किए गए इस साख में सुधार के क्या-क्या फायदा हो सकत्ते हैं और वे कौन सी वजहें हैं कि जिनकी कारण स्टैण्डर्ड एन्ड पूअर्स ने भारत के साख में सुधार करने का निर्णय लिया?

सर्वप्रथम लाभों की चर्चा कर लिया जाए। किसी भी अर्थव्यवस्था के साख के आकलन का उद्देश्य केवल ये पता लगाना होता है कि क्या सरकार अपने कर्ज को समय पर चुकता कर पाएगी या नहीं और आर्थिक, व्यवसायिक एवं निवेश वातावरण कैसा है? खराब साख होने की स्थिति में सरकार को कर्ज मिलने में कठिनाई होती है और जो भी कर्ज मिलता है वो महंगा मिलता है। साथ ही विदेशी निवेश में कमी आती है। अच्छी साख होने पर कर्ज सस्ता और आसानी से मिलता है और विदेशी निवेश की आमद बढ़ती है। भारत के वित्तिय साख में सुधार की स्थिति भारत जैसे देश लिए लाभकारी है। भारत की आर्थिक व सामाजिक स्थिति को देखते हुए इतना स्पष्ट है की भारत को उच्च आर्थिक विकास दर के लिए बहुत बडी मात्रा में निवेश की आवश्यकता है जिसमें विदेशी कर्ज व निवेश दोनों का होना तय है। बहुत सारी आधारभूत संरचनाओं के विकास की परियोजनाएं विदेशी कर्ज या निवेश पर निर्भर हैं। अतः साख में सुधार की वजह से वर्तमान सरकार को भविष्य कि योजनाओं के लिए सस्ता एवं आसान कर्ज की व्यवस्था करने में सहुलियत होगी।

अक्सर ये आरोप लगता रहा है कि केन्द्र में एक निष्क्रिय सरकार है जो दिखती ही नहीं है। ये आरोप सरकार की कमजोरी को ही परिलक्ष्यित करते हैं। परन्तु अगर वर्तमान सरकार के अब तक के निर्णयों का मूल्यांकन किया जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि केन्द्रीय सत्ता में परिवर्तन के पश्चात एक मजबूत सरकार ने स्थान लिया है जो जरुरी वा कठिन निर्णय लेने से हिचक नहीं रही है। साथ ही इस सरकार की प्राथमिकता में प्रशासन को पारदर्शी एवं निर्णायक बनाने जैसे विषय हैं। यही कारण है ये सरकार सत्ता में आते ही प्रशासनिक ढाँचें की पेंच को कसना शुरू कर दिया जो इसके प्राथमिकताओं के प्रति समर्पण को दर्शाता है। साथ ही जनादेश को देखकर स्पष्ट है कि राजनैतिक स्तर पर वर्तमान सरकार स्थिर एवं मजबूत है जो शासन एवं प्रशासन के मामले में कार्य करने को तैयार है। इससे स्पष्ट है कि साख निर्धारण करने वाली संस्थाओं को राजनैतिक स्थिरता एवं शासन-प्रशासन के गुणवत्ता के प्रति चिन्तित होने का कोई मजबूत व स्पष्ट कारण नहीं है। बल्कि इससे आश्वस्त रहा जा सकता है।

जहाँ तक आर्थिक विकास, निवेश हेतु वातावरण एवं अन्य आर्थिक मानकों की बात है तो इन मानकों पर भारतीय अर्थव्यवस्था ने पहले की तुलना अच्छा प्रदर्शन किया है। साल के पहले तिमाही में विकास दर अनुमान से अधिक रहा है जोकि सकारात्मक है। साथ ही विनिर्माण क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव हुआ है। इसके साथ ही मंहगाई को प्राथमिकता देते हुए वर्तमान सरकार ने सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है। अबतक भारत में चुनावों के बाद मंहगाई का बढ़ जाना एक सामान्य एवं सर्वस्वीकार्य तथ्य रहा है। वर्तमान सरकार ने चुनाव के बाद के इन चार महीनों में कुछ सप्ताहों को छोड़कर महंगाई को बढने नहीं दिया है। अतः ये कहा जाए कि समग्र रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था ने आर्थिक मोर्चे पर पहली तिमाही में बेहतर प्रदर्शन किया है। साथ ही ये सर्व विदित है कि भारत एक आर्थिक संभावनाओं का देश है जहाँ की लगभग 85% आबादी युवा 35 वर्ष से की आयु से कम है (Virmani, 2014)। जिसका सीधा अर्थ यह है कि निवेशकों को भारत में एक बहुत बड़ा बना बनाया श्रम एवं उपभोक्ता समूह उपलब्ध है और यह लम्बे समय तक उपलब्ध रहेगा। यह स्थिति उनके निवेश के लिए बहुत फायदेमंद है क्योंकि उत्पादन एवं उपभोग के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। ये सभी कारक भारत को एक बहुत ही आकर्षक व निवेश योग्य अर्थव्यवस्था बनाते हैं।

उपरोक्त विश्लेषण से ये स्पष्ट हो जाता है कि स्टैण्डर्ड एन्ड पूअर्स द्वारा भारत के साख में किया गया सुधार पूर्वानुमानित व अपेक्षित था। भारत के साख में सुधार करके स्टैण्डर्ड एन्ड पूअर्स ने कोई पक्षपात नहीं किया है क्योंकि उसके पास सुधार ना करने की कोई ठोस वजह नहीं है। साथ ही एक दूसरा तथ्य भी है कि अंतर्राष्ट्रीय निवेशक अब धीरे-धीरे अपने निर्णय इन साख संस्थाओं की सूचनाओं का अपने आन्तरिक विश्लेषणों से तुलना करने के बाद ही लेते हैं। इसके साथ ही ये बात भी बहुत महत्त्वपूर्ण है कि भूमण्डलीयकरण के इस दौर में सरकारों को कर्ज बहुत हद तक सरकारों के पारस्परिक आर्थिक संबन्धों पर निर्भर हैं ना कि किसी साख संस्था द्वारा जारी किए गए साख गुणांकों पर।

कदाचित ये संभव है कि अमेरीकी सरकार ने भारत के साख में होने वाले इस सुधार की घोषणा के लिए इसी समय का चयन जान-बूझकर करने के लिए स्टैण्डर्ड एन्ड पूअर्स को कहा हो ताकि भारत को सकारात्मक संदेश भेजा जा सके। कूटनीति के दृष्टि इसे गलत नहीं ठहराया जा सकता है। अन्तराष्ट्रीय राजनीति एवं कूटनीति में प्रतीकों का बहुत बड़ा महत्त्व है और शायद इस सुधार के साथ अमेरीका भारत के साथ अपने संबन्धों को गर्म करने की कोशिश कर रहा हो जोकि विश्व व्यापार संगठन के सरलीकरण समझौते के असफलता के बाद असहज हो गया था (Upadhyay, 2014)।

Bibliography:-

  • Nair, R., Rebello, J., & Ami Shah, A. (2014, September 27). S&P revises India credit rating outlook to stable. Retrieved from Mint: https://www.livemint.com/Politics/tXNip7WfVTfLo46BLIWJSP/SP-revises-India-credit-rating-to-stable-in-boost-for-Modi.html 
  • Upadhyay, R. (2014, August 25). Has India done it Right by not Ratifying WTO’s TFA? Retrieved from The Deliberation: https://www.deliberation.in/2014/08/has-india-done-it-right-by-not.html  
  • Virmani, P. (2014, April 8). Note to India's leaders: your 150m young people are calling for change. Retrieved from The Guardian: https://www.theguardian.com/commentisfree/2014/apr/08/india-leaders-young-people-change-2014-elections
राजीव उपाध्याय
 
 


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