जवाहरलाल नेहरू: भारतीय लोकतंत्र के नींव का पत्थर

जब-जब इस देश में गाँधी, नेहरू, पटेल, अम्बेडकर और दीन दयाल उपाध्याय का नाम लोगों के जुबान पर आता है तो उसके पीछे का कारण कहीं ना कहीं विमर्श ही होता है। कुछ लोग इनके सिद्धान्तों को इस देश के लिए अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण बताते हैं तो कुछ लोग इन सभी के दिए सिद्धान्तों का खण्डन करते हैं। दोनों ही स्थिति स्वागत योग्य है और अच्छा लगता है इस देश इस विमर्श की प्रवृत्ति पर। परन्तु जब इन महान विभूतियों पर बेवजह लांछन लगाए जाते हैं तो दुख होता है। आप इन पर विमर्श और तर्क-वितर्क करिए; बहुत जरूरी है परन्तु राष्ट्र-निर्माण में इनके योगदानों को नकारिए मत। इनका योगदान आपके और मेरी अकेली समझ से कहीं बहुत बड़ा है। खैर यहाँ नेहरू के बारे में। इस छोटे से लेख में नेहरू पर बात करना संभव तो नहीं है परन्तु फिर भी प्रयास रहेगा। 

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू एक राजनेता थे। एक स्टेससमैन के रूप में वे अपनी समझ और सामर्थ्य के अनुसार अपने समकालीन परिस्थितियों में जो कुछ भी देशहित में हो सकता था, करने का प्रयास किया। उनके कुछ निर्णयों से देश को दूरगामी लाभ मिला तो कुछ से दूरगामी नुकसान भी। और इसमें कहीं से कुछ भी असामान्य नहीं है। पूरी दुनिया के इतिहास में एक भी ऐसा राजनेता नहीं मिलेगा जिसके सारे ही निर्णय समय की कसौटी पर सही साबित हुए हों। ये संभव ही नहीं है। सबसे आश्चर्यजनक बात ये होती है कि इस बात को हर राजनेता जानता है फिर भी उसे निर्णय लेना होता है और वो लेता है। नेहरू कहीं भी इससे भिन्न नहीं थे। 

इस देश के करोड़ों नागरिकों को लगता है कि नेहरू एक अत्यंत दूरदर्शी राजनेता थे। उनके द्वारा लिया गया कोई भी निर्णय गलत नहीं हो सकता और उन्होंने जो कुछ भी किया, जो भी निर्णय लिया वो सही ही था। ये लोग नेहरू के विषय में कोई सवाल सुनना नहीं चाहते और जो सवाल करता है उसका बिना सिर-पैर के पुरजोर विरोध करते हैं। वहीं पर करोड़ो नागरिक ऐसे भी हैं जिनको लगता है कि नेहरू ने इस देश का बहुत नुकसान किया। संभवतः सिर्फ नुकसान ही किया है। जो समर्थन में हैं वे नेहरू युग के स्थापित सकड़ों संस्थाओं और लोकतंत्र की दुहाई देते नजर आते हैं और जो विरोध में हैं वे बँटवारा, कश्मीर समस्या, चीन युद्ध में पराजय और परिवारवाद का दोष गिना रहे होते हैं। और सबसे दुखद बात है कि दोनों ही अपने-अपने विचार पर अडिग खड़े होते हैं। थोड़ा सा भी टस से मस नहीं होते। यदि हम देखें तो दोनों ही गलत हैं। नेहरू अपनी कमियों के बिना नेहरू नहीं हैं और नेहरू अपनी उपलब्धियों के बिना नेहरू नहीं हैं। नेहरू या किसी का भी आकलन सिर्फ एक पक्ष को देखकर नहीं किया जा सकता है और जो ऐसा करेगा हमेशा ही गलत निर्णय पर पहुँचेगा। जो पर उठे सवालों को खारिज कर रहे हैं वे नेहरू को ही कमजोर कर रहे हैं और जो नेहरू के योगदानों को देख नहीं सकते वे स्वयं की दृष्टि खराब कर रहे हैं। 

नेहरू एक राजनैतिक कार्यकर्ता थे तो उनके पास राजनैतिक मजबूरियां और दबाव दोनों ही थे और वे संघर्ष करते एक नए राजनैतिक देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे तो ये दबाव और मजबूरियाँ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों ही स्तर पर बहुत ही ज्यादा थीं। इन परिस्थितियों में निर्णय करना कठिन और बहुत ही कठिन था। यदि आपको नेहरू को सम्मान देने का कोई कारण नहीं मिलता हो तो मेरी नजर में एक ही कारण काफी है। भारत के साथ आजाद हुए पाकिस्तान और एक साल बाद आजाद हुए चीन के समाजिक राजनैतिक स्थिति को देखिए; आपका सिर अपने आप झुक जाएगा। भारत के सामाजिक और राजनैतिक लोकतंत्र की नींव के सबसे मजबूत पत्थर का नाम जवाहरलाल नेहरू ही है। वो नेहरू, जो चाहता तो भारत, पाकिस्तान या चीन के रास्ते भी पर जा सकता था जिसमें इन्दिरा गाँधी की इमर्जेंसी एक सामान्य कानून नजर आता। परन्तु नेहरू ने स्वेच्छा से भारत में लोकतंत्र चुना। नहीं तो शायद आज भी हम लोकतंत्र के खातिर लड़ते नजर आते। 

नमन!

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