भारत में मंदी की दस्तक

भारत में मंदी की दस्तक Slowdown in Indian economyभारत में आर्थिक मंदी ने 2015 के अंत से ही दस्तक देना शुरू कर दिया था और इस ओर किसी का भी ध्यान नहीं गया। हालाँकि 2014 में रघुराम राजन ने वित्तीय मंदी की संभावना व्यक्त की थी। 2015 के बाद से ही व्यापार चक्र एवं वित्तीय चक्र सहित विभिन्न लीड इन्डीकेटर स्पष्ट तो नहीं परन्तु संभावित मंदी की ओर इंगित करना शुरू कर दिया था जो दिख नहीं रहा था परन्तु उस मंदी के संकेत अनेक स्तरों जैसे की खपत, प्राइवेट निवेश और जीडीपी की कमी इत्यादि के रूप में अब दिखाई देना शुरू कर दिया है। परन्तु उम्मीद है कि ये मंदी थोड़े समय के लिए ही रहेगी।

आइएलफएस से शुरू हुई एनबीएफसी की समस्या ने पूरी अर्थव्यवस्था को अपने चपेट में ले लिया है और अब यह तरलता की समस्या में बदल चुकी है। पहले से ही बैड लोन से जुझ रहे बैंकिंग सेक्टर अनेक कम्पनियों द्वारा किए गए डिफॉल्ट की वजह से और अधिक दबाव में आ गया है जिस वजह से बैंकिंग सेक्टर में नगदी की मात्रा घट गई है और बैंकों की उधार देने की क्षमता घटी है। प्राइवेट इन्वेस्टमेंट में भी महत्त्वपूर्ण कमी आई है और साथ ही कम्पनियाँ नए प्रोजेक्ट भी नहीं शुरू कर रही हैं। ये स्थिति लम्बे समय से बनी हुई है और इस वजह से नए रोजगार का सृजन नहीं हो रहा है। 

ऑटो सेक्टर शार्ट टर्म मंदी के दौर से गुजर रहा है। महीने दर महीने वाहनों की माँग घट रही है। और इसकी वजह से या तो मजदूरों की छटनी हो रही है या फिर कम्पनियों ने प्रोडक्शन को कुछ समय के लिए सस्पेंड कर दिया है। ऐसा माना जा रहा है कि ऑटो सेक्टर में इस मंदी का मूल कारण बीएस-6 और बीमा संबन्धी नियम हैं। तकनीकी समस्याओं के कारण अधिकतर ऑटो कम्पनी अपनी बीएस-6 की गाड़ियाँ बार-बार वापस मँगा रही हैं जिस कारण से खरीददारों में विश्वास की कमी आई है। साथ ही आईआरडीए के नए आदेश के अनुसार हर वाहन खरीददार के लिए 5 साल के लिए थर्ड पार्टी बीमा खरीदना अनिवार्य हो गया है और इस वजह से वाहनों का ऑन रोड मूल्य बढ़ गया है। ये दो महत्त्वपूर्ण घटनाएं वाहनों की माँग को घटा दिया है और इसका नकारात्मक असर रोजगार सृजन पर पड़ेगा। 

दूसरी ओर अर्थव्यवस्था में खुदरा मुद्रास्फ़ीति का स्तर बहुत ही कम है परन्तु बेरोजगारी की दर अपेक्षाकृत बहुत ऊँची है जोकि अर्थव्यवस्था के लिए कहीं से भी लाभकर स्थिति नहीं है। साथ ही स्टार्ट अप पर एंजेल टैक्स, एवं कैपिटल गेन्स व विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों पर बढ़ाए गए टैक्स सरचार्ज जैसे बजट के कुछ प्राविधानों ने शेयर मार्केट को हतोत्साहित करने का काम किया है। हालाँकि अब इनको वापस ले लिया गया है परन्तु इन प्राविधानों की वजह से शेयर मार्केट को बड़ा नुकसान हुआ है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों में भारत को लेकर अविश्वास का भाव बढ़ा है। 

दूसरी ओर रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में कटौती तो की है परन्तु सभी बैंक इसका लाभ उपभोक्ताओं को नहीं दे रहे हैं। जिसका सीधा असर खपत पर पड़ रहा है। रिजर्व बैंक को ये सुनिश्चित करना होगा कि इस कटौती का लाभ उपभोक्ताओं को मिले ताकि अर्थव्यवस्था में माँग बढ़ सके। 

जहाँ तक संभावित मंदी की बात है तो सरकारें और नियामक संस्थाएँ चाहें जो भी कर लें; हर आठ-दस साल पर मंदी का दौर आता रहेगा। यह ग्लोबल फाइनेंशियल इंटिग्रेशन का बाई-प्रोडक्ट है। एक ओर इस इंटिग्रेशन ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कई दरवाजे भारत के लिए खोला है तो दूसरी ओर पूरी अर्थव्यवस्था में जोखिम को बढ़ाया है।

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