कितना न्यायसंगत है ‘न्याय’?

किसी भी अर्थव्यवस्था के समुचित संचालन में तरलता का बहुत बडा योगदान होता है लेकिन ये तरलता अपने आप में एक तरह की दुधारी तलवार होती है। यदि अर्थव्यवस्था में तरलता बहुत अधिक हो तो भी खतरा है और बहुत कम हो तो भी खतरा है (Ghossoub & Reed, 2010)। इसलिए सरकार और केन्द्रीय बैंक विभिन्न माध्यमों से तरलता को उपयुक्त स्तर पर बनाए रखने के लिए लगातार प्रयासरत रहते हैं। हालाँकि अर्थव्यवस्था में तरलता प्रबन्धन की उत्तरदायित्व केन्दीय बैंक के पास होता है लेकिन सरकार अपनी राजकोषीय नीति के द्वारा अर्थव्यवस्था में तरलता को बढ़ाने की क्षमता रखती है।

किसी भी अर्थव्यवस्था में अधिक तरलता के कारण एक ओर तो आर्थिक गतिविधियों को बढवा मिलता है तो वहीं दूसरी ओर वस्तुओं के माँग बढ़ जाने कारण महँगाई बढ जाती है। वहीं यदि तरलता कम हो तो आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि की गति के घटने की संभावना रहती है जो अनेक अन्य परेशानियों को जन्म दे सकती है। लेकिन यदि अर्थव्यवस्था में तरलता बहुत अधिक या बहुत ही कम हो और यह परिवर्तन अचानक हो तो इससे पुरी अर्थव्यवस्था बूरी तरह प्रभावित होती है और यह स्थिति एक शॉक की तरह काम करती है। बहुत कम समय में बहुत अधिक तरलता बढ़ जाने के कारण अर्थव्यवस्था में वस्तुओं की माँग आपूर्ति के तुलना में बहुत अधिक बढ़ जाता है जिससे अर्थव्यवस्था में माँग व आपूर्ति के बीच का संतुलन बिगड़ जाता है और महँगाई अचानक बढ़ जाती है। इसी तरह अर्थव्यवस्था में अचानक तरलता के कम हो जाने से भी माँग व आपूर्ति का संतुलन बिगड़ जाता है व आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए किसी भी अर्थव्यवस्था के समुचित विकास हेतु तरलता को समुचित स्तर पर बनाए रखना आवश्यक होता है।

चुनावों के दौरान राजनैतिक दलों के द्वारा विभिन्न वायदे करना एक आम बात है। कई बार इन वायदों को करते हुए राजनैतिक दल उन वायदों के कारण भविष्य में आने वाली परेशानियों को भी नजर अंदाज कर देते हैं। इन चुनावी वायदों का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष ये है कि चुनावों के बाद अधिकतर वायदे भूला दिए जाते हैं। भारत में चुनावी वायदों का बहुत ही पुराना इतिहास है। लेकिन चुनावी वायदों का प्रमुखता से चलन इंदिरा गाँधी के ‘गरीबी हटाओ’ के नारे बाद जोर पकड़ा जो समय के साथ और भी महत्त्वपूर्ण व जोरदार होता गया।

पिछले दिनों कॉग्रेस ने ‘न्याय’ नामक योजना घोषणा की जिसके अंतर्गत यदि पार्टी आम चुनाव जीतती हैं तो देश के 20% गरीब परिवारों को सरकार के द्वारा रू 72,000 हर साल दिया जाएगा। कॉग्रेस की इस घोषणा ने आर्थिक विशेषज्ञों के बीच चर्चाओं का एक दौर शुरू कर दिया है। अनेक आर्थिक विशेषज्ञ इस योजना के पक्ष में हैं तो वहीं आर्थिक विशेषज्ञों की एक बहुत बड़ी तदाद इस योजना के विरूद्ध है। जो लोग इसके पक्ष में वे इसे गरीबी खत्म करने का राम बाण बता रहे हैं और जो इसका विरोध कर रहे हैं वे महंगाई, राजकोषीय घाटा, कृषि क्षेत्र में श्रमिकों की कमी और उँची ब्याज दरों आदि जैसे दुष्प्रभावों गिना रहे हैं।

एक अनुमान के अनुसार भारत में तकरीबन 25% से अधिक लोग राष्ट्रीय गरीबी रेखा (32 रुपए प्रति दिन) के नीचे जीवन यापन करते हैं। यदि ऐसा मान लिया जाए कि इस अतिरिक्त धन प्रवाह के बाद भी गरीबी रेखा में कोई बदलाव ना हो और ‘न्याय’ योजना पुरी पारदर्शिता एवं प्रभावी तरीके से लागू हो तो गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या 10% से कम हो जाएगी। इस तरह एक बहुत बड़ी संख्या गरीबी से मुक्त हो जाएगी और ये भारत जैसे विकासशील देश के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। परन्तु यह एक आदर्श स्थिति है जहाँ ये मानकर चला जा रहा है कि महँगाई सहित अन्य सभी आर्थिक कारकों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। लेकिन वास्तविक स्थिति इतनी सरल नहीं होगी। एक अनुमान के अनुसार यदि इस योजना के अंतर्गत 5 करोड़ परिवारों को रू 72,000 प्रतिवर्ष अतिरिक्त धन मिलता है तो धन का ये प्रवाह गरीबी रेखा को बढ़ी हुई महंगाई के कारण वर्तमान के 32 रुपए प्रति दिन से बढाकर बहुत ऊँचा कर देगा और बाकी बचे नागरिक जो गरीबी रेखा के नीचे जी रहे हैं परन्तु इस योजना का लाभ बीस प्रतिशत की सीमा के कारण उठाने पाने से वंचित रह जाते हैं तो वे सभी हानि की स्थिति में होंगे। इस तरह योजना का कुल असर प्रस्तावित अनुमानों की तुलना में बहुत ही कम होगा। हांलाकि ये भी कहा जा रहा है कि इस योजना को लागू करने की स्थिति में राजकोष पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं बढ़ेगा। इसका मतलब ये होता है कि या तो कॉग्रेस के पास राजस्व को 10% तक बढ़ाने की कोई जादूई योजना है (अर्थव्यवस्था को देखते हुए जो संभव नहीं है) या फिर अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के खर्चों को कम किया जाएगा या फिर उनको बन्द कर दिया जाएगा। खर्च कम करने हेतु अन्य विकल्पों में अर्थव्यवस्था में निवेश घटाना आदि भी शामिल हो सकता है। यदि ऐसा होता है तो सामजिक सुरक्षा व अर्थव्यवस्था पर लम्बे समय में बहुआयामी नकारात्मक असर पड़ेगा।

साथ ही इस योजना के साथ सबसे बड़ी समस्या इसके पारदर्शी एवं प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर आएगी। अभी तक भारत में ऐसा कोई डॉटाबेस नहीं है जो सभी नागरिकों की कमाई का सही-सही आकलन कर सके। आयकर विभाग के अनुसार पिछले साल तकरीबन 6 करोड़ नागरिकों ने आयकर रिटर्न फाइल किया था जो कुल आबादी का पाँच प्रतिशत भी नहीं। एक ओर इस डॉटा के न होने कि स्थिति में लोग इस योजना का लाभ लेने के लिए अपनी वास्तविक कमाई छुपाना प्रारम्भ कर देंगे जो अन्ततः एक नए तरह के भ्रष्टाचार को जन्म देगा। दूसरी ओर सही लाभार्थी को लाभ नहीं मिलने की स्थिति में बढ़ी हुई महंगाई के कारण उसका सामान्य जीवन जीना और भी दुर्भर हो जाएगा। इस योजना का तीसरा प्रभाव ये होगा कि इस प्रस्तावित योजना पर होने वाला व्यय हर साल बढ़ता जाएगा जिसका असर अर्थव्यवस्था पर ग्रीस के जैसे ही बहुआयामी होगा (Upadhyay, 2015)। अतः जब तक लोगों की कमाई का सही-सही आकलन करने वाला डॉटा न हो तब तक यह योजना बहुत प्रभावकारी साबित नहीं हो सकती है।

इस योजना के लागू होने की स्थिति में अर्थव्यवस्था में हर साल कम से कम तीन लाख साठ हजार करोड़ रूपए का अतिरिक्त धन प्रवाह होगा जो 1 मार्च 2019 के रिजर्व बैंक के धन प्रवाह के आंकडों के अनुसार उपभोक्ताओं के हाथों में वर्तमान की तुलना में 18% अधिक होगा। इस अतिरिक्त धन के कारण मांगजन्य मुद्रास्फीति की स्थिति पैदा हो जाएगी जो आपूर्ति अनुपलब्धता के कारण लम्बे समय तक बनी रहेगी और इसका असर सबसे अधिक खाद्य पदार्थों पर पड़ेगा। इस तरह ये अतिरिक्त धन बढ़ी हुई महंगाई की स्थिति में चाहकर भी लोगों के क्रय-शक्ति पर बहुत ज्यादा सकारात्मक असर नहीं डाल पाएगा और जिस हेतु से यह धन दिया जा रहा है वो विफल हो जाएगा।

साथ ही इस अतिरिक्त खर्चे के कारण राजकोषीय घाटा भी बढ़ेगा जिसका नकारात्मक असर एक्सचेंज रेट और महँगाई पर पड़ेगा। अंततः रिजर्व बैंक को महँगाई को नियन्त्रित करने के लिए साल 2011 – 2015 की तरह ब्याज दरों को बढाना पड़ेगा जिससे अर्थव्यवस्था में कर्ज महंगा हो जाएगा। परिणाम स्वरुप अर्थव्यस्था में सार्वजनिक व नीजी निवेश घटना शुरू हो जाएगा देगा जिसका नकारात्मक असर आर्थिक वृद्धि, विकास और रोजगार पर पड़ेगा। जिस तरह से 2009 में मनरेगा योजना के लागू होने के बाद अचानक ही श्रम की कीमतों में अत्यधिक व अचानक वृद्धि हो गई थी, ठीक उसी तरह न्याय के लागू होने पर परिस्थिति बनेगी (Nagraj, Bantilan, Pandey, & Roy, 2016)। परिणामतः कृषि क्षेत्र में श्रमिकों की उपल्ब्धता घट जाएगी या फिर कृषि के कुल लागत में श्रम के लागत का अनुपात बढ़ जाएगी जिससे अन्ततः कृषि और ही अधिक अलाभकारी बन जाएगा। ऐसी परिस्थितिजन्य अन्य और कई घटनाओं के कारण अर्थव्यवस्था में माँग गिरेगी और एक चक्र चलेगा जिससे उबरने में अर्थव्यवस्था को सालों लग जाएँगें।

यह भी अनुमानित है यह योजना लोगों को स्थाई रुप से गरीबी से निकाल पाने में शायद ही सक्षम हो क्योंकि ऐसी योजनाएँ लोगों को कुछ समय तक जीवन जीने हेतु साधन उपलब्ध कराने में सहायक सिद्ध तो हो सकती हैं परन्तु उनके जीवन स्थाई बदलाव लाने में सक्षम नहीं हो सकती हैं। जैसा कि विदित है कि लोगों को गरीबी से निकालने का सबसे कारगर और स्थाई उपाय समुचित शिक्षा, रोजगार और कुछ हद तक संस्थागत सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ हैं। अतः ऐसी किसी भी योजना जिसके क्रियान्वयन में इतना अवरोध हो और जिसके लाभकारी-अलाभकारी पक्षों को लेकर स्पष्टता ना हो को लागू करने या स्वीकार करने से पहले सभी हितधारकों को इसके सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों की आवश्यक जाँच कर लेनी चाहिए।

संदर्भ सूची:-

  • Ghossoub, E., & Reed, R. R. (2010). Liquidity risk, economic development, and the effects of monetary policy. European Economic Review, 252-268. 
  • Nagraj, N., Bantilan, C., Pandey, L., & Roy, N. S. (2016). Impact of MGNREGA on Rural Agricultural Wages, Farm Productivity and Net Returns: An Economic Analysis Across SAT Villages. Indian Journal of Agricultural Economics, 176-190.  
  • Upadhyay, R. K. (2015, July 17). ग्रीस संकट और दुनिया. Retrieved from Rajeev Upadhyay: https://www.rajeevupadhyay.in/2015/07/greece-debt-crisis-and-world.html
- राजीव कुमार उपाध्याय

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