मेरी कहानी

तूफान कोई आकर 
क्षण में चला जाता है 
पर लग जाते हैं बरसों 
हमें समेटने में खुद को 
संभला ही नहीं कि बारिश कोई
जाती है घर ढहाकर।

ये सिलसिला हर रोज का है
और कहानी में समय की लकीर को
खींचकर बढाते हैं
घटाते हैं
कि होने का मेरे मतलब
आकर कोई रोज कह जाता है।
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राजीव उपाध्याय

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