विनिर्माण के लिए जरूरी हैं ढ़ांचागत सुविधाएँ

भारत समेत विश्व की अर्थव्यवस्था अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रही है। भविष्य भी अनिश्चितताओं से भरा है। भारतीय अर्थव्यवस्था आजादी के बाद अपने सबसे बूरे दौर से गुजर रही है। इस हालात से निपटने की कोशिशें जारी हैं। देश में विनिर्माण की गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए आत्मनिर्भर भारत योजना शुरू की गई है। हालांकि बैंक लोन पर रिजर्व बैंक द्वारा दिए गए मोराटोरियम के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को विकराल एनपीए की समस्या एवं लम्बे अवधि तक बेरोजगारी का सामना करना पड़ेगा।

आर्थिक गतिविधियों में तेजी आने से बेरोजगारी संकट को हल करने में मदद मिलेगी। भारत सरकार ने आत्मनिर्भर भारत योजना से उपेक्षित विनिर्माण की गतिविधियों को बढ़ावा देने का निर्णय लिया चीनी उत्पादों पर निर्भरता कम करने तथा 101 सैन्य सामानों के आयात पर रोक लगाने जैसे फसले किये गए हैं। अब सवाल ये है कि क्या भारत विनिर्माण की गतिविधियों में आत्मनिर्भर बन पाने में सक्षम है? इस प्रश्न का कोई एक एवं सीधा उत्तर नहीं है। परन्तु ये स्पष्ट होना चाहिए कि दुनिया का कोई भी देश हर वस्तु के उत्पादन में आत्मनिर्भर नहीं हो सकता है। प्रकृतिक संसाधनों के असमान वितरण के कारण हर देश को कुछ वस्तुओं के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना ही पड़ता है। कई आर्थिक कारणों से ये निर्भरता उचित भी है।

भारत निम्न प्रौद्योगिकी की वस्तुओं का उत्पादन लगभग स्वयं ही करता है परन्तु उच्च प्रौद्योगिकी वाले उत्पादों एवं सैन्य सामानों के लिए पूर्ण रूप से आयात पर निर्भर है। मोबाइल फोन, कम्प्यूटर, सोलर पैनल, टेलिकॉम इक्विपमेंट व दवाइयों के एपीआई इत्यादि का उत्पादन भारत में ना के बराबर है। भारत इसके लिए चीन, दक्षिण कोरिया व ताइवान जैसे देशों पर निर्भर है। सरकार को इन क्षेत्रों में हस्तक्षेप कर विनिर्माण को बढ़ावा चाहिए।

उच्च तकनीकी उत्पादों के मूल में शोध एवं अनुसंधान गतिविधियाँ व बौद्धिक संपदा संरक्षण होता है। आज भारत में हर साल लाखों युवाओं को इंजीनियरिंग और पीएचडी करके निकलते हैं लेकिन शोध एवं अनुसंधान के मामले में भारत चीन और अमेरीका से बहुत पीछे है। चीन और अमेरीका अकेले दुनिया कुल पेटेंट आवेदन का 80 प्रतिशत से अधिक आवेदन करते हैं। 2009 से 2019 के बीच भारत ने पेटेंट के सिर्फ 25 हजार आवेदन किया जिसमें से सिर्फ 5 हजार ही सफल रहे। शोध एवं अनुसंधान के लिए सरकार को इस मद में अधिक खर्च करना होगा। सरकार को बौद्धिक संपदा के संरक्षण के लिए अधिक खर्च करना होगा।

साथ ही हर तरह के उत्पादों के विनिर्माण के लिए पूरे देश में कुछ मूलभूत संरचनात्मक ढाँचों को होना आवश्यक है। उन संरचनाओं में बिजली, जल एवं यातायात संबन्धी संरचनाएँ महत्त्वपूर्ण हैं। अब तक भारत विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) के द्वारा देश के कुछ क्षेत्रों में सुविधा जुटाने का काम करता रहा है परन्तु इस नीति से विनिर्माण गतिविधियों पर एक सीमित एवं पक्षपाती प्रभाव पड़ता है। इसलिए आवश्यक है कि ये संरचनात्मक सुविधाएँ देश के सभी हिस्सों में उपलब्ध हों। सरकार ‘एक जिला, एक उत्पाद’ की नीति को बढ़ावा दे रही है जो उचित भी है साथ ही आवश्यक संरचनाओं एवं इकोसिस्टम के विकास पर ध्यान देना जरूरी है।

देश के सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण (उत्पादन) क्षेत्र का कुल योगदान 16 प्रतिशत से थोड़ा अधिक है लेकिन यह लगातार गिर रहा है। इससे स्पष्ट है इस पर ध्यान नहीं गया और आवश्यक इकोसिस्टम तैयार नहीं हो पाया। पीपीई किट्स एवं विंटिलेटर के लिए भारत पूरी तरह से आयात पर निर्भर था परन्तु महामारी के दौरान कुछ ही महीनों में भारत इसके उत्पादन में ना सिर्फ आत्मनिर्भर हो गया बल्कि दुनिया निर्यात भी करने लगा है। यदि सरकार उचित इकोसिस्टम उपलब्ध कराए तो भारत भी विनिर्माण के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकता है।

राजीव उपाध्याय
 
(प्रभात खबर राष्ट्रीय संस्करण 15 अगस्त 2020 को प्रकाशित)

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