बुल्डोजर विमर्श

यह महान देश विमर्शों का देश है। यहाँ की उपजाऊ भूमि ने विमर्श की एक महान परम्परा को पुष्पित व पल्लवित किया है। इस महान धरा का मेरे ऊपर यह असर हुआ कि मैं भी वार्तालाप के माध्यम से विमर्श की महान परम्परा में अपना गंभीर योगदान देना शुरू कर दिया है।

इस गंभीर योगदान का विषय बना है 'बुल्डोजर विमर्श' और इस विमर्श में सार्थक योगदान दिया है मेरे ही दो मनों ने!


नं. एक - मेरा मानना है लोगों को सरकार व बुल्डोजर के प्रति आभार व्यक्त करना चाहिए।
नं. दो - किन्तु क्यों?
नं. एक - सरकार का काम है लोगों के जीवन की आपाधापी व संघर्षों को कम करना। सरकार बुल्डोजर के माध्यम से यही कर रही है।
नं. दो - तुम कहना क्या चाहते हो?
नं. एक - देखो। मेरी बात समझो। उससे पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो।
नं. दो - पूछो।
नं. एक - यदि मुझे आम या इमली के पेड़ से ढ़ेर सारे आम या इमली पत्थर मार के गिराना है तो क्या इस काम के लिए मुझे ढ़ेर सारे पत्थर इक्कट्ठा करना नहीं पड़ेगा?
नं. दो - हाँ। करना पड़ेगा।
नं. एक - अच्छा। तो क्या ये आसान काम है व्यस्त जीवन में? वो भी तब जब लोगों के पास समय की भयंकर कमी है!
नं. दो - निश्चित रूप से कठिन कार्य है।
नं. एक - अच्छा ये बताओ कि यदि कोई व्यक्ति तुम्हारी परेशानी को समझ कर तुम्हें बिना किसी खर्चे के ढ़ेर सारे पत्थर उपलब्ध करा दे तो क्या तुम्हें इस व्यक्ति के प्रति आभार व्यक्त नहीं करना चाहिए?
नं. दो - हाँ। बिल्कुल करना चाहिए।
नं. एक - तो सरकार भी यही तो कर रही है बुल्डोजर चलाकर!
नं. दो - तुम कहना क्या चाहते हो?
नं. एक - यही कि जिसे पत्थर चाहिए चलाने के लिए, उसको पत्थर उपलब्ध करा रही है ताकि पत्थर इक्कट्ठा करने की परेशानी से वे बच जाएँ। यह तो वेलफेयर का काम हुआ ना?

No comments:

Post a Comment