सेना द्वारा कश्मीर बाढ़ में राहत कार्य करना अत्याचार है

बुद्धिजीविता का क्या है? बेचारी वो तो बेवश होती है तर्कों की! तर्क मतलब जिसे बुद्धिजीवी तार्किक माने! आवश्यक नहीं है कि वो बात तथ्यपरक ही हो। बस पसन्द आना चाहिए!

किसे?

अरे! भाई बुद्धिजीवी को। छोड़ो! आपकी समझ नहीं आएगा।

खैर।

मेरे कुछ अति विद्वान एवं बुद्धिजीवी मित्र हैं। वे बेचारे भारतीय सेनाओं (गलती से हिन्दुस्तानी मत पढ़ लेना) के कुकर्मों को याद कर-कर बहुत रोते हैं। बहुत मतलब दिन-रात! इतना अधिक कई बार आँसू रोना छोड़कर सोचना शूरू कर देते हैं कि उन्हें अब रोना चाहिए या नहीं! खैर! लगता है आँसू भी प्रलापी हो गए हैं।

हाँ तो मेरे दोस्तों को लगता लगता है कि भारतीय सेना बहुत ही अत्याचारी है। अत्याचारी मतलब खालिस अत्याचारी! क्यों? क्योंकि उनकी गोलियों से दस आतंकवादियों के साथ एक मासूम भी शिकार हो जाता है। जैसे पुरानी फिल्मों राजकुमार हिरन का शिकार करता है। बिल्कुल उसी स्टाइल में। (ये अलग बात है कि आतंकवादियों की गोली से अक्सर मासूम ही मरते हैं परन्तु वो जिहाद कर रहे होते हैं इसलिए इस स्थिति में मासूम का मरना ठीक है। एकदम जायज!)। चलो इसके लिए तो सेना को गाली बनती है। मतलब भरपूर।

खैर खबर ये है कि कश्मीर की अमन पसन्द आवाम ने राहत कार्य में लगे जवानों पर पत्थर बरसाकर थैंक्यू बोलना शुरू कर दिया है। अब तो ठीक है ना। जैसे को तैसा!

वैसे मैं बहुत संशय में हूँ भाई! कन्फ्यूज आदमी जो हूँ। वैसे सेना तो बाकायदे गलत है पर अभी तो सही काम ही कर रही है? या फिर उसे राहत कार्य में नही लगना चाहिए?

विद्वान एवं बुद्धिजीवी फैसला सुनाएं अपना।

कहीं कोई खतरनाक योजना तो नहीं है!

शुभ रात्रि!

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