शीला दीक्षित: एक बड़ा वृक्ष

शीला दीक्षित, Sheila Dixit
जीवन की गति को लोग चक्रीय कहते नहीं थकते परन्तु जाने क्यों ये मुझे अजीब लगता है? क्या कारण है नहीं जानता? परन्तु इसके चक्रीय होने में अक्सर भ्रम हो जाता है। मुझे लगता है जैसे ये शंकुवन का कोई शंकुवृक्ष हो जिस पर एक ओर से चढ़ते-चढ़ते उसके शिखर पर पहुँचे ही होते हैं कि आप सरककर वहीं पहुँच जाते हैं जहाँ से आपने चढ़ना शुरु किया था। 

अक्सर ऐसा होता है कि हमें वो भी याद आने लगते हैं जिनसे हमारा कोई सीधा सीधा मतलब नहीं होता है और शायद यही उन याद आने वाले लोगों की जीवन की कमाई है। खरी कमाई। कई बार मिश्री की तरह मीठी तो कई बार नमकीन या फिर कड़वी। बहुत कड़वी। 

ये उन दिनों की बात है जब मुझ पर संगीत और साहित्य का एक ऐसा नशा चढ़ा हुआ था कि दिल्ली के किसी भी कोने में किसी भी समय कार्यक्रम में शरीक होने पहुँच ही जाता था। ये बात शायद 2003 या 2004 की है जब मैं स्नातक की पढ़ाई कर रहा था। सिविल लाइन्स के शाह आडिटोरियम में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब का शहनाई वादन का कार्यक्रम था। एक लीजेंड जिसे सुनने की तमन्ना किसे ना हो। और तब जब वह कार्यक्रम आपके बगल में हो और डीटीसी का बस पास आपकी जेब में तो कहना ही क्या क्योंकि ये बस पास आपको दिल्ली में कहीं भी बिना हींग-फिटकरी लगे आपके मंजिल तक पहुँचा देने में सक्षम था। खैर उस कार्यक्रम में शीला दीक्षित जी मुख्य अतिथि थीं परन्तु उनसे मतलब किसे था? कम से कम मुझे तो बिल्कुल ही नहीं था। मेरा तो बस एक ही मकसद था और वो था उस्ताद साहब को सुनना। बहरहाल शीला दीक्षित जी निर्धारित समय से तकरीबन 15-20 मिनट या फिर थोड़ी और अधिक देर से कार्यक्रम में आईं। दीप प्रज्वलन के बाद कार्यक्रम शुरु हुआ और वो सामने वाली सीट पर बैठकर सुनने लगीं। 

कार्यक्रम शुरू होने के थोडी देर ही वो निकलने की तैयारी करने लगीं। उनके आसपास की हलचल को देखकर बिस्मिलाह साहब इस बात का एहसास को हो गया कि शीला जी अब जाने की तैयारी में हैं। शीला दीक्षित जी जैसे ही अपने स्थान से जाने लिए खडी हुईं खान साहब ने बजाना छोडकर उनके डाँटते हुए सख्त लहजें में पूछा, 

'एक तो आप देर से आईं और अब तुरंत जा रही हैं। जब सुनना नहीं था तो आईं ही क्यों?' 

इस झिड़की को सुनकर शीला जी बिना कुछ कहे अपनी जगह पर बैठ गईं और अपने साथ वाले व्यक्ति को कुछ बताकर बाहर भेज दिया। वह तब तक बैठी रहीं जब तक कार्यक्रम खत्म नहीं हुआ और ये शायद डर से नहीं था बल्कि उस्ताद साहब के सम्मान में। इतना ही नहीं बल्कि जाते हुए वे खान साहब से पैर छूकर आशीर्वाद लेकर गईं। 

शीलाजी का का एक कलाकार के सामने झुकना, उनका ये व्यवहार मेरे लिए तो एकदम ही अजूबा था। मैं हैरान था कि इतना शक्तिशाली व्यक्ति और इतनी शालीनता! कैसे हो सकता है? इनके पहले सिर्फ अटल जी को इतना बड़प्पन वाला व्यवहार करते देखा था। बडे लोगों के बारे में ऐसी बातें बस पढी या सुनी थी पर देखा दुसरी बार था। उस दिल फलदार वृक्ष के झुकने होने की बात में यकीन हुआ था। कारण बड़ा स्पष्ट था। अटल जी और शीला जी के पूरे व्यक्तित्व में बहुत फर्क था और कोई तुलना ही नही। खैर। उस दिन मैं बस एक लीजेंड को सुनने आया था पर संयोग से दो लीजेंड्स को देखा था। 

पता नहीं दिल्ली को दुबारा उतने बड़े व्यक्तित्व का नेतृत्व फिर कब मिल पाए?

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