घुटन से झुकती जाती है

घुटन से झुकती जाती है सर्द रातों में हवा जब
बूँदें हौले से आकर तुम्हारी सूरज रेशमी कर जाती हैं।
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जब इश्क था तो बेवफा, दोनों हुए होंगे।
कोई जल के रह गया, कोई बुझ के रह गया।
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तमाम उम्र हमने गुजारी तंग-ए-बदहाली संग
शौक अब लुफ़्त की आदत पड़ती नहीं॥
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मेरे पैरों की मिट्टी ही मेरे असबाब हैं
दूब पर बिखरी ओस ये मेहराब हैं॥
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है ही नहीं कुछ ऐसा कि मैं कहूँ कुछ तुमसे
बात मगर जुबाँ तक आती है कोई ना कोई।
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