कोरोना संक्रमण के माइल्ड केसों में डिस्चार्ज नीति में बदलाव

सरकार द्वारा कोरोना मरीज़ों के डिस्चार्ज की पॉलिसी में जिस तरह के बदलाव की बात हो रही है उसे लेकर सरकार को सचेत रहने की आवश्यकता है। कम से कम हड़बड़ी में ऐसा कोई भी निर्णय नहीं लेना चाहिए जो पुरानी गलतियों को दुहरा रही हों! लॉकडॉउन कारण अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ी मार पड़ी है परन्तु हड़बड़ी में लॉकडॉउन में छूट देकर सरकारों ने देश को कोरोना के खिलाफ मिली बढ़त को खो देने जैसी गलती की जिसे फिर से दुहराया नहीं जा सकता। जबकि मजबूती और बिना किसी समझौते के (चाहें लोगों और अर्थव्यवस्था को थोड़ी दिक्क्त होती जो अब भी हो रही है) देश में लॉकडॉउन लागू हुआ होता तो आज की तुलना में हालत बहुत ही बेहतर होते। इस तरह हड़बड़ी में आकर देश ने खुद को मजबूत करने एवं दुनिया को बेहतर रास्ता देने का एक बहुत बेहतर मौका खो दिया है!

चर्चा है कि माइल्ड केसों में मरीजों को बिना टेस्ट किए ही डिस्चार्ज करने की बातें हो रही हैं। कहीं ऐसा ना हो माइल्ड केसों को डिस्चार्ज कर प्रशासन द्वारा रिकवरी रेट को बढ़ाने करने के चक्कर में पूरे देश में कोरोना वायरस सामुदायिक संक्रमण ना फैलने लगे! मजदूरों के वापस अपने गाँवों में लौटने के बाद उन जिलों में कोरोना के मामले मिल रहे हैं जहाँ कोरोना का कोई मामला था ही नहीं।

आज जब कहा जा रहा है कि देश में कोरोना संक्रमण के अधिकतर मामले एसिम्पटोमैटिक हैं तो क्या इस अवस्था में कोरोना संक्रमण के हल्के मामलों को भावी खतरा न मानकर डिस्चार्ज करना एक गलत निर्यण नहीं होगा?

राजीव उपाध्याय

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