हर्ड इम्यूनिटी की ओर कदम बढ़ाती दिल्ली

दिल्ली सरकार का आदेश है कि दिल्ली में स्थित सभी कार्यालय (जो केन्द्र सरकार के निषेधित सूची में नहीं हैं) अपनी पूरी क्षमता के साथ खुल सकते हैं। हालाँकि मुख्यमंत्री जी का आग्रह है कि ‘वर्क फ्रॉम होम’ की परम्परा को प्राथमिकता देते हुए उसे बढ़ावा दिया जाए। कौन सा व्यापारिक प्रतिष्टान किस क्षमता के साथ ऑपरेट करेगा इससे संबन्धित सभी निर्णयों की जिम्मेदारी दिल्ली सरकार द्वारा व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर छोड़ दिया गया है। हालाँकि केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने कुछ निषेधों को लेकर सख्त रुख दिया है फिर भी ये डेलिगेशन कुछ ठीक वैसा ही है जैसा केन्द्र सरकार ने लॉकडॉउन के संबन्ध में सभी निर्णय लेने की जिम्मेदारी राज्यों को दे दी है!

ये अच्छी बात है कि अर्थव्यवस्था को खोला जा रहा है। आखिर कब तक पूरी अर्थव्यवस्था को ऐसे ही बन्दकर रखा जा सकता है? ये आज नहीं तो कल तो होना ही था! अब तक बन्दी ही जाने कितने करोड़ों लोगों को कर्ज और गरीबी के जाल में वापस खींच लेगी! इस सत्य को खैर अब धीरे-धीरे ही हमें मानना ही पड़ेगा कि हमें कोरोना के साथ शायद अभी सालों जीना है। वैसे भी दिल्ली सरकार कोरोना वायरस से लड़ने का बेहतर विकल्प ‘हर्ड इम्यूनिटी’ को ही मानती है।

ये आवश्यक है कि यदि कार्यालयों को खोला जा रहा है तो सरकार को साथ ही यातायात के साधनों को भी खोलना चाहिए। एक गरीब कर्मचारी जो महीने में औसतन दस से पंद्रह हजार रूपए तक ही कमा पाता है और यातायात के लिए पब्लिक ट्रॉंसपोर्ट का इस्तेमाल करता है (क्योंकि उसके पास अपना वाहन नहीं है) वो कैसे रोज अपने कार्यालय आएगा-जाएगा? इस कमाई में ओला-उबर या फिर किसी टैक्सी या ऑटो का किराया दे पाना उसकी क्षमता के बाहर की चीज है। आवश्यक है कि दिल्ली सरकार इस ओर भी सोचे क्योंकि किसी भी तरह से ऐसे कर्मचारियों के लिए पंद्रह हजार कमाकर दस या पंद्रह हजार रूपए किराए पर खर्च कर पाना निःसंदेह संभव नहीं होगा और कार्यालय ना जा पाने की स्थिति में उसे वेतन नहीं मिलेगा। ये निर्णय ऐसे कर्मचारियों के लिए दोहरी मार वाला निर्णय साबित ना हो सरकार को उस दिशा में सोचना चाहिए।

राजीव उपाध्याय

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